बाड़मेर। मारवाड़ के अत्यधिक गर्म और रेतीले इलाके में, जहाँ पानी की कमी और मौसम की मार के कारण पारंपरिक फसलें उगाना भी बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, वहाँ सुपका गाँव के एक प्रगतिशील युवा किसान धर्मपाल चौधरी ने अपनी मेहनत से रेगिस्तान की छाती पर अंगूर की सफल बागवानी कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। उनकी इसी अनूठी कृषि तकनीक और दृढ़ संकल्प को अब राष्ट्रीय पटल पर एक बड़ी पहचान मिली है। देश की राजधानी नई दिल्ली के प्रतिष्ठित संविधान क्लब में आयोजित एक भव्य समारोह के दौरान धर्मपाल चौधरी को 'भारत गौरव राष्ट्रीय पुरस्कार' से नवाजा गया है। इस गौरवमयी कार्यक्रम में भारत सरकार के एमएसएमई निदेशक हरीश चंद्र, संयुक्त राष्ट्र असेंबली के सदस्य शशि कुमार और इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स एंबेसडर ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष डॉ. अविनाश सुकुंडे जैसी देश-विदेश की कई नामचीन हस्तियों ने शिरकत की।

चार साल के कड़े संघर्ष और आधुनिक सोच से लहलहाए बाग

रेगिस्तान की रेतीली मिट्टी में अंगूर की मिठास घोलना धर्मपाल के लिए कतई आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने पारंपरिक ढर्रे से हटकर वैज्ञानिक तौर-तरीकों को अपनी खेती का आधार बनाया। उन्होंने नियमित रूप से पौधों की सेहत की निगरानी की, बूंद-बूंद सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया और मौसम के थपेड़ों से पौधों को बचाने के लिए सटीक प्रबंधन को अपनाया। करीब चार साल की अनवरत साधना और कड़ी मशक्कत के बाद आखिरकार मरुभूमि की सूखी धरती पर अंगूर के हरे-भरे गुच्छे झूमने लगे। अपनी इस कामयाबी से उत्साहित होकर उन्होंने केवल अंगूर तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि इसके साथ-साथ अपने खेतों में सीताफल, पपीता, अनार और अमरूद जैसे फलों की बागवानी का भी सफल प्रयोग किया, जिससे आज उनकी कृषि आय में काफी शानदार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।

नई पीढ़ी और क्षेत्र के अन्नदाताओं के लिए बने मार्गदर्शक

धर्मपाल चौधरी की इस ऐतिहासिक कामयाबी ने कृषि जगत की इस पुरानी धारणा को पूरी तरह से बदल दिया है कि मरुस्थलीय इलाकों में केवल चुनिंदा पारंपरिक फसलें ही उगाई जा सकती हैं। उन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि अगर सही वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नई सोच को अपना लिया जाए, तो विपरीत से विपरीत परिस्थितियाँ और कठिन भौगोलिक क्षेत्र भी बेहतर मुनाफे वाली खेती के आड़े नहीं आ सकते। उनकी इस प्रेरणादायी उपलब्धि को देखकर अब क्षेत्र के तमाम दूसरे किसान भी पारंपरिक खेती के घाटे से उबरकर आधुनिक बागवानी और नकदी फसलों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, जिससे पूरे ग्रामीण परिवेश में समृद्धि का एक नया दौर शुरू होने की उम्मीद जग गई है।